चैलेंजिंग चांशल Part 1 – प्लानिंग और यात्रा की शुरुआत।

अगस्त 2015 का इतवार, मैं दोपहर का खाना खा कर ऊँघ रहा था कि तभी डॉक्टर साहब (डॉ मनीष कंसल) का फ़ोन आया।
डॉक्टर साहब भी मेरी तरह घुमक्कड़ी के कीड़े के सताये हुए थे। 3 महीने से कहीं भी जाने को नही मिल पा रहा था और हम दोनों ही कहीं भी जाने को तड़प रहे थे।

बातों-बातों में तय हुआ कि गूगल पर सर्च करते हैं, जो भी पहली जगह, जिसका नाम हमने नहीं सुना होगा, वहीं चलेंगे। गूगल पर नाम आया ‘चांशल’.. अमाँ ये क्या बला है ?

थोड़ा खोजने पर पता चला कि चांशल पास हिमाचल प्रदेश में स्थित है और यह रोहड़ू शहर को डोडरा और क्वार घाटी से जोड़ता है। चांशल पास की ऊंचाई लगभग 3750 मीटर है और ये शिमला से 160 किलोमीटर की दूरी पर है।

चूंकि हम थोडे ज़्यादा दिन घूमना चाहते थे, हमने थोड़ा और रिसर्च के बाद इसी प्लान में चकराता भी शामिल कर लिया।

तो रूट कुछ इस प्रकार था –

ग़ाज़ियाबाद – देहरादून – चकराता – देवबन – त्यूनी – आराकोट – हाटकोटी – रोहड़ू – चांशल

प्लान बन गया था, और कुछ और साथी भी जुड़ गए थे सभी नाम ये हैं –

1. डॉ मनीष कंसल

2. विकास भदौरिया

3. दीपक गुप्ता

4. गुरदीप जग्गी

5. प्रशांत

6. रोहित राज

7. प्रवीन गुलैया

सभी लोग अपनी अपनी मोटरसाइकिल पर थे, सिवा मेरे, मैं डॉक्टर साहब की मोटर साईकल पर पीछे बैठ कर जा रहा था क्योंकि मेरी मोटरसाइकिल (बजाज डिस्कवर) घर से बज़ार और सब्जी मंडी जाने के अलावा कही और ले जाने पर बुरा मान जाती थी।

मेरी और डॉक्टर साहब की दोस्ती यूँ तो ज़्यादा पुरानी नही थी मगर एक ही मोटरसाइकिल पर काफी बार साथ सफर करने से हमारा संग विक्रम और बेताल की तरह हो गया था।
हर बार वो मुझे मेरे पेड़.. मतलब.. घर लेने आते थे, में पूरे रास्ते उनके पीछे बैठ कर बक बक करता और वो हर बात का जवाब हां-हूं में देते रहते थे। यहां मुझे तारीफ करनी पड़ेगी उनकी सहनशक्ति की। न जाने कैसे वो हर बक-बक झेल लेते थे। मैं होता तो डांट के चुप करवा देता।

वापिस यात्रा पर आते हैं..।

सब प्लान हो गया, लोगों से बातचीत हो गयी, रूट तय हो गया, कहाँ कहाँ रुकना है, वो भी प्लान हो गया।… कुल मिला के एक अच्छी, योजनाबद्ध यात्रा शुरू होने वाली थी।

मगर वो सफर ही क्या जो प्लान के मुताबिक हो जाये।।

सितंबर 2015

आखिर 25 सितंबर आ ही गया। रात के 11 बजे हम सबको ग़ाज़ियाबाद में मेरठ रोड पर मिलना था। तय समय पर सभी पहुच गए.. डॉ साहब ने सबको मोटरसाइकिल पर यात्रा करते समय बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताया और एक एक दौर चाय के बाद यात्रा शुरू हुई रात के 12 बजे।

अगले दिन सुबह देहरादून पहुंच कर चकराता रोड पर नाश्ता हुआ और फिर हम निकल पड़े चकराता के लिए।

विकासनगर तक तो सड़क सही थी, मगर उसके बाद रोड खराब होती गयी। बारिश का मौसम खत्म हो चुका था मगर भूस्खलन के निशान जगह-जगह देखे जा सकते थे। हम जैसे तैसे कर के, भगवान का नाम ले के चले जा रहे थे।

एक मोड़ घूमने करने के बाद हमने देखा कुछ लोग ढोल-बाजा बजाते हुए एक पालकी ले के चले आ रहे हैं। पूछने पर मालूम हुआ कि ये पालकी महासू देवता की है और लोग उन्हें नीचे यमुना नदी में स्नान करवाने के बाद महासू देवता के मंदिर में वापिस ले जा रहे हैं। हमने भी हाथ जोड़ कर महासू देवता को प्रणाम किया, अपनी यात्रा की सफलता की कामना की और प्रशाद ग्रहण कर के चल पड़े फिर चकराता की तरफ।

चकराता पहुचने से पहले एक आर्मी चौकी पड़ी जहां हमे रोक कर आर्मी वालो ने पूछताछ करी की हम कहां से आ रहे हैं और कहां जाना है।
मेरे गले मे कैमरा लटका हुआ देख कर वहां तैनात जवान ने मुझे इसे बैग में रखने को कहा।
यहां बता दूं कि चकराता एक आर्मी केंट है और किसी भी आर्मी की बिल्डिंग की फोटोग्राफी मना है।

यहाँ से निकल कर हम सीधे चकराता में पहुँचे जहां ठहरने की व्यवस्था प्रशांत ने पहले ही करवा रखी थी।

यहां पर कोई खास होटल नही थे और हमे किसी अच्छे होटल की उम्मीद भी नही थी। हम कमरे में पहुचे, अपना सामान पटका, हाथ मुँह धोये और निकल पड़े चकराता घूमने।

इंटरनेट पर पढ़ा था कि यहाँ ‘tiger fall’ नाम का एक झरना है जो मशहूर है। हमने आस पास के लोगो से पूछा और निकल पड़े मोटरसाइकिल उठा कर टाइगर फॉल की तरफ जो कि चकराता से शायद 12 कि मी था।

टाइगर फॉल तक जाने वाली रोड उस समय बन ही रही थी और पूरा रास्ता कच्चा और पत्थरों से भरा हुआ था। थोड़ी दूर चलने के बाद लगा कि हम रास्ता भटक गए हैं इसलिए एक पैदल जा रहे आदमी को पूछा। उसने कहा वो भी वही जा रहा है। फिर क्या था, एक और बेताल एक और विक्रम की पीठ पर लद गया।।

करीब 8 कि मी जाने के बाद उस आदमी ने हमे बाइक रोकने को कहा और बोला कि यही है टाइगर फॉल. मगर वहां तो पहाड़ के अलावा कुछ नही था। उसने कहा कि हमें बाइक सड़क पर खड़ी कर के 200 मीटर नीचे पैदल जाना पड़ेगा।

सड़क सुनसान थी और कोई ट्रैफिक नही था। इसलिए बाइक किनारे खड़ी कर के हम चल पड़े टाइगर फॉल की तलाश में। करीब 50 मीटर के बाद एक लड़का मैग्गी और चाय बेच रहा था। पूछने पर उसने बताया कि हम सही रास्ते पर है और 150 मीटर आगे जाने पर पुल पार करके टाइगर फॉल मिल जायेगा। हम ने वैसा ही किया मगर वह पुल अभी बन रहा था किसी तरह डरते डरते वो आधा बना पुल पार किया और पहुंच गए टाइगर फॉल।

टाइगर फॉल को ढूंढना आसान नही है। जब तक आप इसके 50 मीटर नज़दीक तक नहीं पहुच जाते, आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि यहां पर कोई झरना भी है। प्रकृति अपने मोती बहुत सहज कर, छुपा कर रखती है।

टाइगर फॉल की सुंदरता का जितना वर्णन किया जाए, वो कम है। 300 फुट की ऊंचाई से गिरता झरना, इतनी भयंकर गर्जना कर रहा था कि हमे अपनी बात कहने के लिए चिल्लाना पड़ रहा था। खैर, सामने झरना था, और हम धूल में सने हुए, थके हुए अब और इंतेज़ार नही कर पाए। बस कपड़े उतारे और कूद पड़े पानी में। काफी देर तक नहाने के बाद हम बाहर निकले, तैयार हुए और चल पड़े चकराता की ओर। इस बार बाइक की धीमी रफ्तार परेशान नही कर रही थी क्योंकि हमारा तन मन एकदम तरोताज़ा था।

होटल पहुचते हुए शाम हो गयी थी। अतः हम अपने कमरों तक ही सीमित रहे। हवा की वजह से थोड़ी ठंड पड़ने लगी थी, इसलिए ठंड भागने वाले ‘पुराने साधु’ का सहारा लिया गया।

होटल वाले ने बताया कि खाने का आखिरी आर्डर वो 9 बजे तक ही लेगा, उसके बाद स्टाफ 10 बजे तक अपने घर चला जायेगा।

बाहर आ कर तला और मसालेदार खाना खाने के मूड में कोई नही था। अतः हमने सादा खाना जैसे अरहर की दाल और आलू की सब्ज़ी ही आर्डर किया। खाना बहुत स्वादिष्ट था। हम सारा खाना खा गए मगर मन नही भरा। अंत मे होटल वाले ने कह ही दिया कि सब खत्म हो गया है अब कुछ नही मिल सकता। कितने भुक्खड़ हो गए थे हम सब।

खाना खाने के बाद देर रात तक चकराता की सुनसान सड़को पर चहलकदमी करने के बाद, करीब 12 बजे हम आ कर सो गए। अगले दिन हमे रोहड़ू तक पहुचना था और आते समय रास्ते की हालात देख कर लग रहा था कि सुबह जल्दी निकलने में ही भलाई है।

क्रमशः … दूसरे दिन का वृत्तान्त अगली पोस्ट में । दूसरा दिन और भी खूबसूरती और रोमांच से भरा हुआ था।

Link to Part 2

4 thoughts on “चैलेंजिंग चांशल Part 1 – प्लानिंग और यात्रा की शुरुआत।

  1. Pawan kumar

    Very nicely explained ..feeling like i am travelling ..keep it up bhadauria ji and their team
    My best wishes are with u all …waiting eagerly for ur next post

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  2. चलो भाई हमने भी आपकी यात्रा पढ़ने की शुरुआत कर ही दी। आपने बताया कि 2015 में चकराता से फाल की सड़क बन रही थी लेकिन हम तो 2011 में गए थे तब तक ठीक-ठाक थी। बीच में सड़क को चौड़ा करने का कार्य चल रहा हो या किसी आपदा के कारण भूस्खलन हो गया हो, उसी का काम चल रहा हूं बहुत बढ़िया लेखन।

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