चैलेंजिंग चांशल – Part 3 – चिरगाँव से चांशल

Link to Part 2

आज सुबह सभी लोग थोड़ा जल्दी ही उठ गए थे। बाहर गुनगुनी सी धूप निकल रही थी और ठंड का नामोनिशान नही था। ये एक अच्छा संकेत था हमारे लिए। अगर ठंड हो जाती तो 10 तरह के उपाय करने पड़ते, मगर अभी कोई ज़रूरत नही थी।

जल्दी, जल्दी सभी तैयार हुए और 1-1 ब्रेड ऑमलेट खा कर 9 बजे तक रेडी हो गए। समान हमने होटल मालिक के पास ही रख दिया क्योंकि वापिस उसी रास्ते से आना था तो हम वापिस आते हुए समान उठा सकते थे। आज का प्लान रात को ही तय हो गया था कि चांशल कर के संजोली में ठहरेंगे। दीपक जी के वहां 2 फ्लैट्स थे तो होटल का खर्चा बच जाएगा।

आमलेट खाते खाते हमने ढाबे पर काम करने वाले लड़के से चांशल पहुचने का रास्ता पूछा। उसने बताया कि सीधा जाना है। पहले लरोत पड़ेगा, फिर लरोत से 18 घुमावदार बैंड चढ़ के चांशल आ जायेगा। कुल दूरी 35 कि मी थी।
हम आपस मे बात करने लगे कि सिर्फ 35 कि मी है तो 3 घंटे में वापिस भी आ जाएंगे थोड़ा समय चांशल पर बिता के। हम बातें कर रहे थे और वो लड़का हमें टेढ़ी नज़र से देख कर मुस्कुरा रहा था। काश मैं उस समय उसकी मुस्कुराहट का मतलब समझ लेता।

नाश्ता कर के 9 बजे हम सब चल पड़े चांशल फतेह करने। मोटरसाइकिल धीरे धीरे चल रही थी, साथ मे कुछ फुट नीचे कल कल करती नदी बह रही थी और दोनों तरफ हरियाली थी। मन कुलांचें भर रहा था नई जगह देखने की कल्पना मात्र से।

थोड़ी दूर तक तो रास्ता सही रहा, फिर सड़क खराब होने लगी। लेकिन खराब सड़क इतनी खल नही रही थी क्योकी अब दोनों तरफ सेब के बाग थे और सेब का मौसम होने की वजह से पेड़ फलों के भार से काफी नीचे झुके हुए थे।
कश्मीर के बाद हिमाचल का सेब ही सबसे अच्छा माना जाता है और सेब देख के लग भी रहा था। ऐसे बड़े बड़े और लाल सेब मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। एक जगह सबने बाइक रोक कर, पेड़ से सेब तोड़ कर खाए, वाह।। क्या स्वाद था ।। क्या रसीले सेब थे । मानो अमृत का घूंट पिला दिया हो। ऐसे स्वादिष्ठ सेब, वो भी ताज़ा, हम मैदान वालों को कम ही नसीब होते हैं। हमें नसीब होते हैं तो छंटे हुए सेब जिनका दम भी मोम की परत चढ़ा कर घोंट दिया जाता है। सेब में कोई स्वाद ही नहीं रह जाता। अब जब यहां तक आये थे तो खाली हाथ निकलना नही बनता था। सो पास ही खड़े सेब के बाग के मालिक से परमिशन ली और टूट पड़े सेब के पेड़ों पर। जो भी खाली बैग या प्लास्टिक थी हमारे पास, उसमे सिर्फ सेब ही भरे थे। कुल मिला के करीब 30 या 40 किलो सेब हमने भर लिए। किसान को डरते डरते दिखाया तो वो बड़े आराम से बोला – “ले जाओ साहब, इस से ज़्यादा सेब तो यहाँ नालियों में गिर के सड़ जाते हैं।” .. वाह री प्रभु की माया, इन सब के लिए हम तरसते हैं और यहां इनकी कद्र मिट्टी के बराबर है। फिर क्या था, हमने सारे सेब भर लिए। वैसे भी मेरा मानना है कि मुफ्त का तो ज़हर भी नही छोड़ना चाहिए, जाने कब काम आ जाये।

सेब से लदे पेड़

12038869_10153224471077843_2678647347036987259_o

सेब देख कर पागल हुआ प्रशांत

25394864_10155250221507843_2242230356406284163_o

सेब तोड़ने ओर भरने में आधा घंटा चला गया। फिर से चांशल की ओर प्रस्थान हुआ। लरोत तक सड़क की हालत भी दयनीय हो चुकी थी और चढ़ाई भी अच्छी खासी थी।

जैसे ही लरोत पार किया, बमुश्किल 1 कि मी आगे एकदम खड़ी चढ़ाई शुरू हो गई। चढ़ाई करीब 70 डिग्री के एंगल की थी। एक तो डॉ साहब की बाइक वैसे ही थोड़े नखरे कर रही थी, उस पर में भी बैठा हुआ था तो मरते में 2 लात मारने वाली बात ही हो गई थी।

किसी तरह पहले गियर में बाइक चढ़ाई मगर आगे देखा तो और भी कठिन चढ़ाई थी और अब सड़क की जगह कीचड़ भरा रास्ता ही था।

चांशल पर सर्दियों में काफी बर्फ जम जाती है जो पिघलने पर पूरे रास्ते को एक कीचड़ भरी चुनौती बना देती है। बाइक किसी तरह 10 की स्पीड में चढ़ रही थी, जगह जगह इतनी फिसलन थी कि मुझे उतर कर बाइक संभालने में डॉ साहब की मदद करनी पड़ रही थी। बाकी लोगो का भी ये ही हाल था। इंजन की आवाज़ सुन कर लग रहा था कि डॉ साहब की बुलेट डुग-डुग-डुग की जगह तलाक़-तलाक़-तलाक़ कह रही है। 5 कि मी ऐसे ही तय करने के बाद बाइक के इंजन काफी गर्म हो गए थे और बाइक पर पड़ने वाला ज़ोर उसकी आवाज़ में साफ महसूस किया जा सकता था। सो हम सबने एक घास का मैदान देख कर वहीं ब्रेक ले लिया ताकि बाइक के इंजन कुछ ठंडे हो सकें। बुलेट और पत्नी में सिर्फ एक चीज़ अलग होती है, पत्नी रूठ जाए तो फिर भी मना सकते है, बुलेट रुठ जाए तो जान ही निकाल देती है। एक बाइकर के लिए इस से बुरा कुछ नही हो सकता कि उसकी बुलेट चढ़ाई पर बंद हो जाये। बुलेट बन्द होने के 10 से 12 कारण हो सकते है और हमारे पास इतना टाइम नहीं था की बुलेट के रूठने पर थीसिस लिख सकते ।

घास के मैदान में आराम करते दीपक जी

12006472_10153224541422843_4464793770810650854_o

आराम करने के बाद सभी मस्ती करते हुए

25075071_10155235974362843_3952014776365861870_o

करीब आधा घंटा हमने खूब मस्ती की, दुबारा से नाश्ता हुआ, सिर्फ सेब का। आधे घंटे ब्रेक लेने से बाइक में फर्क पड़ा था मगर रास्ता वैसा ही था, खड़ी चढ़ाई और कीचड़ भरा। ऊपर से अब ज़मीन में गड़े पत्थर एक एक फुट बाहर निकल के अपनी उपस्थिति ठीक उसी तरह दर्ज कर रहे थे जैसे क्लास के सबसे छोटे कद के बच्चे टीचर का ध्यान खींचने के लिए अपनी सीट पर खड़े हो जाते है ताकि वो सबसे अलग दिख सके।

किसी तरह राम राम करते हुए रास्ता काट रहा था और हम बहुत ही धीरे ही सही, चांशल के नज़दीक आ रहे थे। हम करीब 11000 फुट की ऊंचाई पर थे तभी मुझे अपने सर में कुछ हल्कापन से महसूस होने लगा और चक्कर से आने लगे। ये AMS के बहुत ही शुरुआती लक्षण है। मैंने डॉ साहब को बताया। उन्होंने बाइक रोकी, अपने बैग में से एक पेनकिलर निकाल के मुझे खाने को दी। दवाई खाने के 10 मिनट बाद सब सही हो गया।

थोड़ा आगे चलने पर कीचड की जगह पथरीले रास्ते ने ले ली और मेरी जान पर बन आयी। बाइक चलाना थकान भरा है तो पीछे बैठना उस से भी ज़्यादा दुखदाई। शरीर मे ऐसी ऐसी जगह दर्द होने लगा था जहां पर मुझे पता ही नहीं था कि कोई मांसपेशी भी है। अब चांशल कुल डेढ़ किलोमीटर रह गया था और मुझसे बिल्कुल भी बैठा नही जा रहा था। अतः फिर रुके, थोड़ा चल-फिर के रक्तसंचार दुबारा से नार्मल करने का प्रयास किया और मन में ठान लिया की अब चांशल पहुच के ही बाइक रुकेगी।

प्रवीन और रोहित – थकान दूर करने के लिए सबसे अच्छी जगह पर

12068397_10153224468407843_8430248924053573017_o

चान्शल से 2 किमी पहले रास्ता.

25487285_10155250221022843_7858837495819454517_o

हम भी शाहरुख़ बन लें

12037954_10153205450727843_2513295078986018767_n

करीब 30 मिनट और चलने के बाद चांशल पास आ गया। हमे पता ही नहीं चला कि हम चांशल पहुँच गए हैं जब तक हमारी नज़र एकमात्र बोर्ड पर नहीं गई जो इस पास का नाम और ऊंचाई बता रहा था। चांशल पास, ऊंचाई 3750 मीटर ( 12300 feet ).

cropped-12002557_10153224541817843_8269064382766089271_o.jpg

हमने बाइक रोकी, उतरे और ज़ोर से चिल्लाये। पूरे रास्ते का दबा हुआ गुस्सा और थकान जो कि खराब सड़क और धीमी रफ्तार की वजह से था, हमने अपने चिल्लाने में निकाल दिया।

जी भर के चिल्लाने के बाद सब बिना कुछ बोले, बोर्ड के पास ज़मीन के उस हिस्से पर बैठ गए जहां थोड़ी घास थी। कोई अपने पैर पड़के था, कोई दुखते हुए पिछवाड़े को दुलार रहा था और कोई सिर पकड़े ये सोच रहा था कि ये करा क्या था हमने।

शरीर मे ताक़त ही नही बची थी और इतनी सुंदरता देख के वैसे भी बोलती बंद हो गई थी हमारी।

चंशल पहुचने की ख़ुशी सबके चेहेरों पर देखी जा सकती थी

25398476_10155250208582843_6884580171897598641_o

डॉक्टर साहब सोचते हुए कि कहाँ आ के फंस गया

12030567_10153224568302843_5410264554813805776_o

पहुँच ही गए, हे भगवान तेरा लाख लाख शुक्र है। घड़ी देखी तो दोपहर के 12:30 हो चुके थे यानी 3:30 घंटे 35 किलोमीटर तय करने में लग गए थे, सूरज ठीक सिर पर था और इतनी ऊंचाई की वजह से धूप शरीर जला रही थी। मगर कोई फर्क नही पड़ता। हमने कर दिखाया।।

अब चांशल से वापिस संजोली जाने का किस्सा अगले पोस्ट में। संजोली जाते समय हमने ये सबक लिया कि ज़रूरी नहीं है कि हर शॉर्टकट आपका समय बचा ही देगा।

Link to Part 4

3 thoughts on “चैलेंजिंग चांशल – Part 3 – चिरगाँव से चांशल

  1. Pingback: चैलेंजिंग चांशल – Part 4 – चांशल से संजोली – Out Of Office ….

  2. Pingback: चैलेंजिंग चांशल – Part 2 – चकराता से चिरगाँव – Out Of Office ….

  3. बाइक पर पीछे बैठकर यात्रा करना सबसे बड़ी गलती साबित होती है अगाडी पिछाड़ी कमाल अंजर पंजर सर दर्द करने लगता है

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s