मुनस्यारी के मलंग – Part 2 – भीमताल से कौसानी

भीमताल से निकल कर हम कौसानी की तरफ चल पड़े। बारिश के मौसम के बाद पहाड़ मानो जीवन का उत्सव मन रहे थे। हर तरफ इतनी हरियाली थी कि लगता था कुदरत ने धरती को हरी चादर ओढ़ा दी हो।

मन प्रसन्न हो गया इतनी हरियाली देख कर। वैसे भी हरा रंग मन को और आंखों को आराम देता है, हमारी तो आंखें नाच गयीं इतनी हरियाली देख कर।

कौसानी पहुँच कर TRH की खोज शुरू की। आसपास लोगों से पूछा गया तो पता चला कि TRH काफी ऊपर चढ़ाई कर के अंत में है। मोटरसाइकिल ले के पहुँचे TRH और जा धमके रिसेप्शन में अपने पूरे श्रृंगार में। सभी ने पूरे राइडिंग गियर्स और हेलमेट अभी भी पहना हुआ था। हमें पूरे राइडिंग गियर्स में देख के वहां का मैनेजर सोच रहा था कि हम या तो किसी और ग्रह से आये हैं, या लूटमार करने, क्योंकि जब तक हमने भीमताल वाले शर्मा जी का नाम नहीं लिया, उसका हाथ सीट के पीछे रखे डंडे पर ही था।

शर्मा जी का नाम सुनने के बाद उसने एक लड़के को बुलाया और हमें कॉटेज दिखाने को कहा। हम लड़के के पीछे चलते चलते जैसे ही बाहर आये, देखा कि बाइक का जायज़ा लेने के लिए बंदरों की पूरी टोली जमा है लेकिन किसी बंदर की हिम्मत नहीं हो रही थी बाइक के पास जाने की क्योंकि एक बंदर बुलेट के गरम साइलेंसर से हाथ जला बैठा था। फिर भी एहतियातन बंदरो को भगा के हमने सारा सामान बाइक से उतार के ले जाने में ही भलाई समझी सो बैग खोल के चल पड़े कॉटेज देखने। मैंने जाते जाते कनखियों से देखा तो बंदर अचरज से हमें ही ताक रहे थे और शायद सोच रहे थे कि हम इंसान version 2 हैं। हम पूरे गियर में लग भी परग्रही जैसे रहे थे।

कॉटेज पर पहुंचे, और जैसे ही दरवाजे से अंदर घुसे, सीलन और वार्निश की मिली जुली तीखी बदबू नाक में घुसी। स्वतः ही हाथ चेहरे पर चले गए। पूरे कॉटेज में छत पर सीलन और लीकेज के निशान मौजूद थे। वैसे तो कॉटेज से नज़ारा अच्छा था परंतु उस गंध की वजह से वहां रुकने का कोई सवाल ही नहीं था। मैनेजर को ‘ना’ बोल कर हम अपना सामान वापिस बांध कर चल पड़े नीचे की तरफ कोई और होटल ढूंढने।

थोड़ा नीचे जा कर कुछ प्राइवेट होटल हैं, एक होटल दिखा ‘कौसानी बेस्ट इन्’ देखने मे सही लग रहा था, सोचा रेट भी पूछ लिया जाए। रेट था करीब 2700 प्रति कमरा प्रति दिन। कमर खुलवा के देखा तो शानदार कमरा था, बिल्कुल साफ सुथरा और अच्छे नज़ारों के साथ। कमरे के सामने ही लॉन था और बर्फीली चोटियों के नजारे भी। शाम के 5 बज चुके थे और हम बुरी तरह थके भी हुये थे सो सबने फैसला किया कि रूम अच्छा है, यहीं रुक लिया जाए।

रूम खुलवाया और सामान रखा। डॉक्टर साहब और रणदीप नहाने की तैयारी करने लगे। मैं अपना सामान खोलने और जमाने लगा। मेरे साथ ये बहुत परेशानी है कि कहीं भी पहुंच कर मेरा समान पूरा फैल जाता है, हर कोने में मेरी चीजें ही दिखाई पड़ती हैं। थोड़ा सा अवव्यस्थित हो जाता हूँ जब मालूम हो कि रात अब यहीं गुज़ारनी है। इतने में मैनेजर आया और आईडी प्रूफ मांगने लगा। मैंने आईडी के लिए अपना बैग चेक किया तो होश उड़ गए, जिस कार्ड होल्डर में मैंने ड्राइविंग लाइसेंस और पैन कार्ड रखे थे, वो कार्ड होल्डर गायब था। बहुत ढूंढा पर नहीं मिला। मूड खराब हो गया कि बिना ड्राइविंग लाइसेंस के आगे कैसे चल पाऊंगा और अगर रास्ते मे चेकिंग हो गयी तो क्या होगा। डॉक्टर साहब और रणदीप ने दिलासा दिया और बोले कि कहीं चेकिंग होगी तो देखेंगे, लेकिन यात्रा तो पूरी करनी है।

मूड खराब था तो अब सुधारना भी था, फिर से बूढ़े साधु को याद किया गया। रूम सर्विस से बोल के 1-1 जग गरम और सादे पानी का मंगाया, मेज कुर्सी लॉन में लगाई और चिप्स वगेरह ले के बैठ गए थकान दूर करने। पास में ही माल्टा का पेड़ था। माल्ट देख के दिमाग मे एक खुरापात सूझी, तोड़ लाये माल्टा और निचोड़ दिया गिलास में थोड़ा थोड़ा। आहा !! स्वाद आया, ऐसा स्वाद तो कभी नहीं मिला। बूढ़े साधु के साथ, आपस मे बातें करते करते, सूर्यास्त में बर्फीली चोटियों के नजारे देखते देखते शाम बिताई गयी। ऐसा सुकून मिला कि बस क्या बताएं, इसी सुकून को ढूंढने हम इतनी दूर आये थे। रणदीप और डॉ साहब यूँ तो पहली बार मिले थे मगर दोनों ऐसे बातें छोंक रहे थे मानो कितने बरसों से साथ हैं। यही सबसे अच्छी बात लगती है घूमने की, अनजान लोग भी कुछ समय में अच्छे दोस्त बन जाते है।

मुझे तो जब किसी को परखना होता है तो अपने साथ एक बार घूमने ले जाता हूँ। इंसान झूठ का आवरण थोड़े समय के लिए तो ओढ़ सकता है मगर जब 2 या 3 दिन साथ में रहना और सफर काटना होता है तो कौन कितने पानी में है, सब पता चल जाता है।

रात हुई और खाना खा के हम सब ऐसे सोये मानो 1 जन्म से नींद की तलाश में हों।

अगले भाग में चलेंगे चौकोड़ी, एक छोटा सा, बेहद खूबसूरत गाँव जो अभी लोगों की नज़र से दूर ही है।

One thought on “मुनस्यारी के मलंग – Part 2 – भीमताल से कौसानी

  1. मलंगों की टोली में यह नहीं चलेगा एक-दो तो फोटो लगाना था यार
    कम से कम अपने उसी अवतार का फोटो लगा देते। इसे कहते हैं दूसरे ग्रह के प्राणी एलियन। बढ़िया बात बंदर वाला सीन बहुत बढ़िया रहा।
    आख़िर में एक सच्ची बात लिख दी यदि किसी को हमें जांचना है आजमाना है उसके साथ दो-तीन दिन की यात्रा कर लो आदमी की औकात बाहर आ जाती है यह मैंने देखा है और जिसके साथ एक बार भुगत लिया जिंदगी में फिर उसके साथ यात्रा नहीं करनी है

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